जसपाल राणा भारतीय निशानेबाजी की उपलब्धियों के साथ सांस्कृतिक जगत में उनकी खास पहचान के लिए जाने जायेंगे। विश्व स्तर पर निशानेबाजी में स्वर्ण पदक विजेता खेल जगत में ही नहीं बल्कि उत्तराखंड के सांस्कृतिक जगत में भी एक खास पहचान के लिए जाने जायेंगे।
उत्तराखंड के किसी अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी को शायद ही किसी को यह सम्मान मिला हो कि जिसे उत्तराखंड के गढरत्न महान लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने उसके नाम पर पूरा गीत रचा हो। निशानेबाज जसपाल राणा देश के उन चुनिंदा खिलाड़ियों में से एक थे,जिनकी उपलब्धियां खेल जगत के अलावा लोकगीतों तक पहुंचीं और जन-जन की जुबान पर पहली पसंद बनी।
नब्बे के दशक में जब जसपाल राणा अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी में भारत का नाम रोशन कर रहे थे,तब उनकी सफलता से प्रेरित होकर गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी ने ‘बंदूक्या जसपाल राणा’ सिस्क साजि दें,निशणू साजि दें उत्तराखंड मा बाग लगू बाग मारि दे नाम से गीत गाया।
यह गीत बाद में उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय गीतों में शामिल हुआ और कैसेट युग में घर-घर लोकप्रिय हुआ।
आज भी उत्तराखंड की नई पीढ़ी इस गीत को बड़े चाव से सुनती है। यह गीत केवल एक खिलाड़ी की प्रशंसा में नहीं था, बल्कि उस दौर के उत्तराखंड के युवाओं के सपनों का प्रतीक था। पहाड़ के एक बेटे ने विश्व मंच पर निशानेबाजी में पहचान बनाई तो लोकसंगीत ने भी उसे अपने तरीके से अमर कर दिया।
उत्तराखंड में लोकगीत आमतौर पर सामाजिक सरोकारों, संस्कृति और लोकजीवन पर आधारित होते हैं, लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी जी द्वारा ऐसे में किसी खिलाड़ी पर पूरा गीत लिखा जाना और उसे गाकर निशानेबाज जसपाल राणा की लोकप्रियता का प्रमाण माना जाता है।
आज दिवंगत निशानेबाज जसपाल राणा के निधन के बाद इंटरनेट मीडिया पर भी ‘बंदूक्या जसपाल राणा नामक’ गीत का हर जुबा पर जिक्र हो रहा है। उत्तराखंडी जन मानस आज इस गीत को सोशल मीडिया पर साझा कर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। खेल और संस्कृति के इस दुर्लभ संगम ने जसपाल राणा को केवल एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बना दिया।
!!*बंदूक्या जसपाल राणा’ सिस्क साधि दें लोकगीतनिशानेबाज जशपाल राणा को अमर कर गया*!!
