!!…..*आस्था पर चोट या व्यवस्था की विफलता?*….!!✍️ *डा. कमल किशोर डुकलान ‘सरल’*

अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर में चढ़ावे की राशि में कथित हेराफेरी का मामला केवल वित्तीय अनियमितता का विषय नहीं है, बल्कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है। जिन लोगों ने दशकों तक रामशिला पूजन से लेकर मंदिर निर्माण तक राम मंदिर आंदोलन का समर्थन किया, समय-समय पर राम मंदिर निर्माण के संघर्षों में भाग लिया और मंदिर निर्माण के लिए अपने तन-मन-धन से सहयोग दिया, उनके लिए यह चंदा चढ़ावे की चौरी का प्रकरण स्वाभाविक रूप से चिंता और पीड़ा का कारण बन सकती है।

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण सदियों पुराने धार्मिक विश्वास, आस्था और सामाजिक आंदोलन की एक लंबी कानूनी प्रक्रिया का परिणाम है। आज यह मंदिर न केवल भारत, बल्कि विश्वभर में हिंदू आस्था, श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन चुका है। ऐसे में यदि दान और चढ़ावे के प्रबंधन में किसी प्रकार की गड़बड़ी सामने आती है, तो उसका प्रभाव केवल राम मंदिर के अर्थ तंत्र पर नहीं बल्कि कोटि-कोटि हिन्दुओं की भावनात्मक सामाजिकता पर भी पड़ेगा।

अयोध्या प्रकरण पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि चढ़ावे की राशि में अनियमितता की आशंका थी तो प्रारंभिक स्तर पर ही इसकी गंभीर जांच क्यों नहीं की गई? मामले के सार्वजनिक होने के बाद जिस प्रकार मीडिया में राजनीतिक बयानबाजी शुरू हुई, उसने पूरे प्रकरण को और अधिक चर्चा का विषय बना दिया। विपक्षी दलों ने इसे सरकार और ट्रस्ट की जवाबदेही से जोड़कर सवाल उठाए, जबकि मंदिर प्रशासन की ओर से शुरुआती दौर में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी से इनकार किया जाता रहा।

हालांकि बाद में जांच एजेंसियों की कार्रवाई के दौरान कुछ लोगों के पास से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने और संपत्तियों के संबंध में जानकारी सामने आने के बाद मामले ने गंभीर रूप ले लिया। इससे यह सवाल भी उठता है कि यदि अनियमितताएं हुईं, तो वे कब से चल रही थीं और निगरानी तंत्र उन्हें समय रहते पकड़ने में क्यों विफल रहा?

यह भी चिंताजनक बात है कि दानपात्रों की सुरक्षा, राशि की गणना और बैंक में जमा करने की प्रक्रिया जैसी संवेदनशील व्यवस्थाओं में पर्याप्त पारदर्शिता और तकनीकी निगरानी पहले से प्रारंभ से ही सुनिश्चित क्यों नहीं की गई। आधुनिक समय में सीसीटीवी निगरानी, डिजिटल रिकॉर्डिंग और बहुस्तरीय ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं सामान्य मानी जाती हैं। यदि ये व्यवस्थाएं पहले से प्रभावी रूप में लागू होतीं, तो भगवान के मंदिर जैसे स्थलों पर शायद किसी भी प्रकार के संदेह की स्थिति उत्पन्न नहीं होती।

भले ही उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विशेष जांच दल (SIT) का गठन एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। लेकिन जांच का उद्देश्य केवल दोषियों की पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि व्यवस्था में ऐसी कौन-सी कमियां थीं, जिनके कारण कथित अनियमितताओं का समय पर पता नहीं चल सका। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या जिम्मेदारी का अभाव रहा है, तो उसके लिए जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

अयोध्या में देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का केंद्र बने भगवान श्रीराम के मंदिर जैसे प्रतिष्ठित धार्मिक स्थल पर दान की प्रत्येक राशि श्रद्धालुओं के विश्वास का प्रतीक होती है। इसलिए आवश्यक है कि चढ़ावे के प्रबंधन में पूर्ण पारदर्शिता,जवाबदेही और आधुनिक निगरानी तंत्र सुनिश्चित किया जाए। इससे न केवल भविष्य में ऐसी घटनाओं की संभावना कम होगी, बल्कि श्रद्धालुओं का मंदिरों में दान के प्रति विश्वास भी और मजबूत होगा।

आस्था के किसी भी केंद्र मंदिरों में यदि दान की राशि को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं, तो उससे सबसे अधिक नुकसान आस्था और विश्वास का होता है। इसलिए यह भी आवश्यक है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध हो तथा जो भी दोषी पाए जाएं, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। आखिरकार, श्रद्धा और विश्वास की रक्षा केवल धार्मिक दायित्व नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

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